अरस्तू की जीवन गाथा अरस्तू परिचय : अरस्तू को जीव विज्ञान और प्राणीशास्त्र के पिता के रूप में जाना जाता है; वह प्राचीन ग्रीस में शास्त्रीय काल के दौरान एक यूनानी दार्शनिक और पॉलीमैथ थे। प्लेटो उनके शिक्षक थे। उनके लेखन में भौतिकी, जीव विज्ञान, प्राणीशास्त्र, तत्वमीमांसा, तर्कशास्त्र, नैतिकता, सौंदर्यशास्त्र, कविता, रंगमंच, संगीत, भाषणकला, मनोविज्ञान, भाषा विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति, मौसम विज्ञान, भूविज्ञान और सरकार सहित कई विषय शामिल हैं। अरस्तू ने उनसे पहले मौजूद विभिन्न ...
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चार्ल्स डार्विन
नाम: चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन
जन्म तिथि: 12 फरवरी 1809
स्थान: शारूज़बरी,शोरोपशर
पिता: रॉबर्ट वारिंग डार्विन
मृत्यु: 19 अप्रैल 1882
स्थान: डॉन,कैंट
योगदान: थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन
जन्म और परिवार:
चार्ल्स डार्विन का पूरा नाम चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन था और उनका जन्म 12 फरवरी,1809 को इंग्लैंड के शरूज़बरी,शोरोपशर के एक धनी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रॉबर्ट वारिंग डार्विन था जो एक सफल डॉक्टर थे और उनकी मां का नाम सुजाना वेज वुड था।
चार्ल्स डार्विन की उम्र जब महज 8 वर्ष की थी उसी समय उनकी मां का देहांत हो गया था।इसके बाद उनके लालन पालन की जिम्मेदारी पूरी तरह से उनके पिता और उनकी बड़ी बहन ने उठाई।
बचपन:
अपनी आत्माकथा में डार्विन लिखते हैं कि महज़ 8 वर्ष की उम्र में वह कीट पतंगों को जमा करने में बहुत रुचि दिखाते थे।
इसके लिए वह जीवित नहीं बल्कि मृत्यु कीड़ों को जमा करते थे क्योंकि उनकी बहन ने उन्हें बताया था कि केवल संग्रह के लिए कीड़ों को मारना ठीक बात नहीं है। बड़े होने पर भी दुर्लभ कीड़ों के संग्रह खत्म नहीं हुआ। कीट पतंगों के प्रति उनकी रुचि और प्रेम को दर्शाती एक रोचक घटना का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है कि बचपन में उन्हें एक ही जगह पर तीन दुर्लभ की दिख जाए हाल में इन कीटों को नहीं देना चाहते थे उन्होंने झट से कीटो को अपने दोनों हाथों में पकड़ तीसरे कीट को जल्दबाजी में मुंह में दबा लिया तभी मुंह वाले कीट के शरीर से कोई तीखा द्रव निकला कारण से मुंह वाला कीट रुकना पड़ा और वह भाग गया।
कीट पतंगों के जमा करने के अलावा उन्हें विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों को जमा करने रसायन शास्त्र के मजेदार प्रयोगों को करने में खूब मज़ा आता था।
शिक्षा:
चार्ल्स के पिता उन्हे अपनी तरह एक सफल डॉक्टर बनाना चाहते थे पर चार्ल्स थोड़े नाजुक मिजाज़ के इंसान थे। 16 साल की उम्र में जब आयुर्विज्ञान की पढ़ाई के लिए उन्हें एडिनबरा विश्वविद्यालय भेजा गया तो वहाँ पर उन्होंने दो दर्दनाक ऑपरेशन को अपनी आंखों से देखा दर्दनाक इस दृष्टिकोण से कहा जा सकता है क्योंकि उस समय तक शल्य चिकित्सा वाले मरीजों को बेहोश करने के लिए किसी भी तरह की दवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता था और होशो हवास में उनका ऑपरेशन किया जाता था जो बड़ा पीड़ादायक होता था। इन दो ऑपरेशन को देख कर चार्ल्स ने अपने डॉक्टर बनने का विचार त्याग दिया 1828 में उन्होंने एडिनबरो विश्वविद्यालय छोड़ दिया और इसके बाद अध्यात्म शास्त्र की पढ़ाई के लिए उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया गया। कैंब्रिज विश्वविद्यालय जाकर भी उन्होंने अपने विषय में सिर्फ इतना ही ध्यान दिया कि वह परीक्षा में सफल हो जाएं और उन्हें डिग्री मिल जाए। कॉलेज में अपनी आध्यात्मशास्त्र की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कॉलेज के वनस्पति शास्त्र और भूगर्भ शास्त्र के शिक्षकों से दोस्ती कर ली थी।
जीवन में नया मोड़:
झ्सी तरह वक्त गुजरता गया और 1831 में उनके जीवन में एक बड़ा फैसला लेने का मौका आया इसी साल 'एचएमएस बीगल' नाम के समुद्री जहाज को दुनिया की वैज्ञानिक यात्रा पर जाना था, जिसमें एक प्रकृति वैज्ञानिक की जरूरत थी यह पूरा सफर कैप्टन फिजरॉय की देख रेख में पूरा होना था।
इसी काम के लिए कैंब्रिज के इनके दो दोस्तों ने इस चार्ल्स का नाम सुझाया इस तरह चार्ल्स डार्विन को 5 साल के इस लंबे वैज्ञानिक सफर का प्रस्ताव मिला।
शुरू में चार्ल्स के पिता इस लंबे सफर पर अपने बेटे को भेजने के लिए नहीं थे पर चार्ल्स की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने अपने बेटे को इस लंबे सफर पर जाने की इजाजत दे दी।
इस जहाज में सवार सभी लोगों को अपनी अपनी जिम्मेदारियां सौंपी गई थी चार्ल्स डार्विन का काम था अलग-अलग प्रजाति के जीवो का जीवाश्म यानी फॉसिल इकट्ठा करना।
इस सफर के दौरान चार्ल्स ने दुनिया के अलग-अलग जीवो के बारे में खूब तजुर्बा किया।
उन्होंने अनेक विलुप्त जीवों के अवशेष जमा किए और इन अवशेषों की वर्तमान में जीवित जीवो से तुलना की।
गालापैगोस द्वीप समूह पर इन्होंने कछुओं,इगुनाओं और प्रवालों का अध्ययन किया।
इन जीव जंतुओं को देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। यहाँ उन्होंने इतना बड़ा कछुआ देखा जिस पर वह खुद सवार हो गए।
चार्ल्स ने जब एक द्वीप में रहने वाले जंतुओं की तुलना दूसरे द्वीप में रहने वाले जंतुओं से की तो उन्होंने पाया कि यह ये जीव आकार,रंग और बनावट में एक-दूसरे से काफी अलग थे।अपने इन्हीं अनुभवों के आधार पर चार्ल्स को अपना विकासवाद का सिद्धांत पेश करने में मदद मिली इसके अलावा उन्होंने इस लंबे सफर के अनुभव को अपनी किताब 'वॉएज ऑफ बिगल' में भी लिखा है।
नए सिद्धांत की रचना:
चार्ल्स डार्विन का यह सफर 1831 से 1836 तक चला। अपने इस लंबे सफर से प्राप्त अनुभवों और अपने गहन अध्ययन के आधार पर तथा थॉमस रॉबर्ट माल्थस के विचारों से प्रभावित होकर डार्विन ने 'थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन' की रचना तो अपने मस्तिष्क में कर ली पर उनका यह सिद्धांत बाइबल में उल्लेखित बातों से मेल नहीं खाते थे और उस दौर में यूरोप तथा इंग्लैंड क समाज में बाइबल के विरुद्ध कोई भी सिद्धांत स्वीकार्य नहीं था यहां तक कि दंडनीय था। इन्हीं संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने 20 वर्ष से अधिक समय तक अपना यह सिद्धांत प्रकाशित नहीं करवाया।
विवाह:
इसी दरमियान विवाह के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर काफी सोच विचार करने के बाद उन्होंने 1839 ई० में ऐम्मा वेजवुड नामक महिला से विवाह कर लिया।
सिद्धांत का प्रकाशन:
1858 के आसपास 'अल्फ्रेड रसेल वालेस' नामक एक प्रकृति वैज्ञानिक ने चार्ल्स डार्विन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने विकासवाद के बारे में अपनी वैसी ही राय जाहिर की जैसी राय डार्विन की थी। डार्विन और वालेस ने 1858 में संयुक्त रूप से अपना रिसर्च पेपर पेश किया।इसके बाद 1859 में इन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाय नेचुरल सेलेक्शन' प्रकाशित करवाई। किस किताब का पहला एडिशन छपते ही बिक गया। इस पुस्तक में उन्होंने अपने पास जमा नमूनों के आधार पर इस बात का सबूत दिया कि आज के जीवो के अनेक रूप किसी एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं।
डार्विन ने यह भी बताया कि जीवन के संघर्ष में केवल उपयुक्त जीव ही जीवित रह पाते हैं और दूसरे मर जाते हैं। वह इस नतीजे पर पहुंचे कि एक ही पूर्वज से पैदा हुए जीव वातावरण के प्रभाव से धीरे-धीरे बदलते गए और आज की शक्ल में आ गए। इस किताब के छपते ही तहलका मच गया क्यों के इसमें जीवो की उत्पत्ति के बारे में पहले से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का खण्डन किया गया था हालांकि बाद में इस किताब में दर्ज विचारों को उस समय के बड़े वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार कर लिया गया था।
परिवर्तनशील विज्ञान:
जैसा कि हम जानते हैं कि विज्ञान स्वयं 'थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन' को फॉलो करता है यानी जब कोई नया और ज्यादा बेहतर सिद्धांत किसी वैज्ञानिक द्वारा पेश किया जाता है तो वह पुराने सिद्धांत को विस्थापित कर देता है। वर्तमान में कई ऐसे बड़े वैज्ञानिक भी मौजूद है जो चार्ल्स डार्विन की इस थ्योरी से हटकर अपनी राय रखते हैं और डार्विन के सिद्धांत से सहमत नहीं है।
अब तक अपनी सत्यता पर अडिग सिद्धांत:
निरंतर परिवर्तनशील विज्ञान में जहां नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों को विस्थापित कर रहे हैं वहीं डार्विन का यह सिद्धांत 150 सालों से भी ज्यादा समय से टिका है और कब तक टिका रहता है समय के गर्भ में छुपा है।
डार्विन द्वारा लिखित मुख्य किताबें:
डार्विन ने कई और किताबें जैसे 'द वेरिएशन ऑफ एनिमल्स एंड प्लांट्स अंडर डोमेस्टिकेशन', 'द पावर ऑफ मूवमेंट इन प्लांट्स' और 'डिसेंट ऑफ मैन' आदि लिखी है जो काफी प्रसिद्ध है
मृत्यु:
विज्ञान के विकास के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले इस महान वैज्ञानिक का 19 अप्रैल 1882 को डॉन,कैंट में देहांत हो गया और इन्हें वेस्ट मिनिस्टर एवा में सर आइज़क न्यूटन कि कब्र के करीब ही दफन किया गया।
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